
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ब्रिक्स समूह के देशों पर अतिरिक्त 10% टैरिफ लगाया जाएगा. ब्रिक्स के संस्थापक देश ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के अलावा इसके नए सदस्य मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई भी इस चेतावनी की जद में हैं. ट्रंप ने दावा किया कि ब्रिक्स की स्थापना अमेरिका को नुकसान पहुंचाने के लिए की गई थी और वह जल्द ही इस समूह के साथ जुड़ने वाले देशों पर अमेरिका-विरोधी नीतियों के चलते दंडात्मक शुल्क लगाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की बातचीत कर रहा भारत भी नहीं बचेगा. यह दूसरी बार है जब उन्होंने ब्रिक्स को धमकी दी है़ जनवरी में उन्होंने इसके सदस्यों पर 100% टैरिफ की बात कही थी़ ट्रंप की टैरिफ के नाम पर जिस तरह से दुनिया में दादागिरी जमाने की कोशिश हो रही है, वह आने वाले समय में ब्रिक्स को और मजबूत कर सकता है़ दुनिया ट्रंप के समझौते और टैरिफ के दांव पूरे होने का इंतजार कर रही है और अपना नफा-नुकसान तोल रही है. इसके बाद एक नया वर्ल्ड ऑर्डर बनना तय है और यह अमेरिका विरोधी भले न हो, लेकिन अमेरिकी दादागिरी से जरूर मुक्त होगा़ ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती चीन हो सकता है, लेकिन अमेरिका से मुकाबला करने के लिए चीन को साथ रखना फिलहाल मजबूरी है़
ट्रंप की नाराज़गी की वजह क्या है?
डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि ब्रिक्स अमेरिकी डॉलर को वैश्विक मुद्रा के रूप में हटाना चाहता है. उन्होंने आरोप लगाया कि ब्रिक्स का उद्देश्य डॉलर को समाप्त करना है ताकि किसी अन्य देश संभावित रूप से चीन की मुद्रा को वैश्विक मानक बनाया जा सके. उन्होंने मीडिया से कहा कि अगर हमने डॉलर का वैश्विक मानक खो दिया तो हम वही देश नहीं रहेंगे. डॉलर राजा है और हम इसे ऐसा ही बनाए रखेंगे़
अगर ट्रंप के डर के मुताबिक ‘डि-डॉलराइजेशन’ होता है तो डॉलर की मांग घटेगी, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर के हथियार के रूप में उपयोग की रणनीतिक क्षमता दोनों प्रभावित होंगी़
वास्तव में ब्रिक्स कितना शक्तिशाली है?
48% वैश्विक आबादी ब्रिक्स देशों में रहती है
31% का योगदान है वैश्विक जीडीपी में
35% भारत का व्यापार इन्हीं देशों के साथ है
2006 में पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह बनकर शुरू हुआ था ब्रिक्स
11 सदस्य और 10 साझेदार देशों का ब्लॉक बन चुका है यह
हालांकि इसमें गहरे मतभेद भी हैं लेकिन फिर भी इसमें शामिल होने के लिए देशों की लंबी कतार है और यही बात विकसित देशों व अमेरिका को बेचैन करती है़
क्या ब्रिक्स वाकई अमेरिका-विरोधी है?
नहीं. इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक दक्षिण यानी ग्लोबल साउथ की आवाज़ बनना है, ताकि विकासशील देशों को विकास के अधिक अवसर मिल सकें.
ब्रिक्स ऐसे संस्थानों और इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना चाहता है जो विकसित देशों के नियंत्रण से बाहर हों. इसका न्यू डेवलपमेंट बैंक सदस्य देशों की परियोजनाओं को फंड करता है़
ब्रिक्स एक ऐसा वैश्विक भुगतान तंत्र बनाना चाहता है जो पश्चिम द्वारा नियंत्रित स्विफ्ट सिस्टम का विकल्प बन सके़
हाल ही में ब्राज़ील में हुई ब्रिक्स शिखर बैठक में अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों तथा ईरान पर हुए हमले की आलोचना की गई़
क्या ब्रिक्स अमेरिकी डॉलर को समाप्त करना चाहता है?
ब्रिक्स का उद्देश्य अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करना है, उसे समाप्त करना नहीं.
ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने शिखर सम्मेलन में इसे दोहराया़
ब्रिक्स एक साझा मुद्रा बनाना चाहता है, जिससे सदस्य देशों के बीच व्यापार और भुगतान आसान हो जाएं.
इससे अमेरिका किसी सदस्य देश पर डॉलर को हथियार बनाकर प्रतिबंध नहीं लगा सकेगा, क्योंकि अभी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार की आरक्षित मुद्रा है़
साझा मुद्रा की योजना अभी शुरुआती चरण में है़
भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता ब्राज़ील से लेगा.