
देश में सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) वैक्सीन शुरू की जा चुकी है और 14 वर्ष की सभी लड़कियों को मुफ्त टीकाकरण के लिए जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि लड़कों को भी यह टीका लगाना उतना ही जरूरी है। लड़के इस वायरस के मौन वाहक (साइलेंट कैरियर) बन सकते हैं। वे खुद भी असुरक्षित रहते हैं और वे अनजाने में अपने साथ-साथ अपने पार्टनर के लिए भी खतरा बन सकते हैं। हालांकि यह वायरस लगभग 99 प्रतिशत सर्वाइकल कैंसर का कारण बनता है, लेकिन इसके अलावा यह जननांग मस्से, पेनाइल कैंसर, एनल कैंसर और ओरोफैरिंजियल कैंसर (गले और मुंह का कैंसर) के भी कई मामलों के लिए जिम्मेदार है। इसी कारण 2026 की शुरुआत तक दुनिया के 50 से अधिक देशों ने ऐसे राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किए हैं जिनमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं, ताकि सामूहिक प्रतिरक्षा बढ़े और विभिन्न प्रकार के कैंसर को रोका जा सके। इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और जर्मनी शामिल हैं।
बेंगलुरु के नारायण हेल्थ सिटी में गाइनकोलॉजिक ऑन्कोलॉजी के क्लिनिकल लीड डॉ. रोहित रघुनाथ रणाडे कहते हैं, यह वायरस लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता। भारत में सर्वाइकल कैंसर का बोझ बहुत अधिक है, इसलिए लड़कियों का टीकाकरण जरूरी है, लेकिन हमें लड़कों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक पुरुष कई दशकों तक बिना किसी लक्षण के उच्च जोखिम वाले एचपीवी वायरस को शरीर में लिए रह सकता है और 50 की उम्र में जाकर उसे उन्नत अवस्था के गले के कैंसर का पता चल सकता है। भारतीय बाल चिकित्सा अकादमी लड़कों के लिए भी एचपीवी टीकाकरण की सिफारिश करती है, लेकिन फिलहाल सरकार के मुफ्त राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान में केवल लड़कियां ही शामिल हैं।
लड़के कितने संवेदनशील हैं?
एचपीवी के बारे में सबसे बड़ा भ्रम यह है कि जिन लोगों के पास गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) नहीं है, वे सुरक्षित हैं। लेकिन वैज्ञानिक रूप से यह सही नहीं है। सितंबर 2023 में ‘द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ’ में प्रकाशित एक अध्ययन में दुनिया भर के 30,000 से अधिक पुरुषों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि 15 वर्ष से अधिक उम्र के हर तीन में से कम से कम एक पुरुष किसी न किसी प्रकार के जननांग एचपीवी से संक्रमित है। इसके अलावा हर पांच में से एक पुरुष इस वायरस के उच्च जोखिम वाले कैंसर पैदा करने वाले प्रकार को वहन करता है। लगभग सभी आयु वर्गों में यह संक्रमण पुरुषों में महिलाओं की तुलना में अधिक पाया गया। पुरुषों में पैप स्मीयर जैसी नियमित जांच नहीं होती, इसलिए वे कई वर्षों तक इस वायरस को अपने शरीर में लिए रहते हैं और अनजाने में संक्रमण फैलाने का स्रोत बन जाते हैं।
पुरुष “साइलेंट कैरियर” कैसे बन जाते हैं?
महिलाओं के लिए सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम अक्सर दर्दनाक जांच, चिंताजनक स्क्रीनिंग और पॉजिटिव रिपोर्ट से जुड़ी सामाजिक कलंक की भावना से गुजरती है। इसके विपरीत पुरुषों में अक्सर इस वायरस के बारे में पूरी तरह अनभिज्ञता होती है। जब कोई पुरुष एचपीवी वैक्सीन लगवाता है, तो वह केवल खुद को ही नहीं बल्कि अपने साथी के स्वास्थ्य की भी जिम्मेदारी लेता है।
सामूहिक प्रतिरक्षा का विज्ञान
यदि केवल लड़कियों का टीकाकरण किया जाए, तो वायरस पुरुषों में फैलता रहता है। इससे संक्रमण की शृंखला पूरी तरह नहीं टूटती और वे महिलाएं जो टीका नहीं लगवा पातीं या जिनकी प्रतिरक्षा कमजोर होती है, वे अधिक जोखिम में रहती हैं। लेकिन जब लड़कों का भी टीकाकरण किया जाता है, तो संक्रमण की यह शृंखला टूट जाती है। वायरस को फैलने के लिए कम होस्ट मिलते हैं और परिणामस्वरूप महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के मामलों में तेजी से कमी आती है।



