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सीईसी के खिलाफ महाभियोग की कवायद ममता की हताशा

प्रस्ताव का पास होना दूर की कौड़ी, पेश हो जाए यही काफी

विपक्ष इस सप्ताह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित “पक्षपाती आचरण” को लेकर महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। इस प्रक्रिया में वही तरीका अपनाया जाएगा जो किसी सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए अपनाया जाता है। अगर संसद के मौजूदा संख्याबल को देखा जाए तो इस प्रस्ताव का परित होना असंभव है, क्योंकि सत्तापक्ष किसी भी तरह से इसके समर्थन में नहीं है और विपक्ष के पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है। कुछ दिन पूर्व लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ भी इसी तरह की कवायद की गई थी और विपक्ष मतदान के समय संसद से वाकआउट कर गया था। ऐसी ही स्थिति इस मामले में हो सकती है। हालांकि इससे पहले सवाल इसके स्वीकृत होने का भी है। देखा जाए तो यह पूरी कवायद ममता बनर्जी के खुद के अहम से जुड़ी हुई है और वे अगले महीने होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव से पहले यह दिखाने की कोशिश कर रही हैं कि चुनाव आयोग ने उनके खिलाफ साजिश की। ममता इस मसले से व्यक्तिगत तौर पर सुप्रीम कोर्ट में भी दलील रख चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसके बावजूद बंगाल में एसआईआर पर न तो कोई रोक लगाई और न ही आयोग की कार्यवाही को गलत माना। इसके विपरीत सु्प्रीम कोर्ट ने आयोग को पर्याप्त संख्या में अधिकारी व पुलिस सुरक्षा न देने के लिए बंगाल के मुख्य सचिव व डीजीपी को कड़ी फटकार भी लगाई। यही नहीं आयोग ने बंगाल हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस को एसआईआर की निगरानी का काम सौंपने के साथ ही बंगाल, झारखंड व उड़ीसा के न्यायिक अधिकारियों को एसआईआर की प्रक्रिया पूरी करने के काम में लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खाने के बाद ममता ने अब महाभियोग का दांव चलकर आयोग पर दबाव बनाने की नई कोशिश की है।

विपक्ष का तर्क क्या है?

सूत्रों के अनुसार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस द्वारा शुरू की गई इस पहल के तहत विपक्ष ने कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का मसौदा तैयार कर लिया है और सांसदों से आवश्यक संख्या में हस्ताक्षर जुटाए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक उनके खिलाफ एक प्रमुख आरोप उनका “पूरी तरह पक्षपाती व्यवहार” बताया गया है। तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है कि उसने पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया। यह आरोप विशेष रूप से मतदाता सूची के विषेश गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान लगाया गया, जब आयोग ने केवल इसी राज्य में वैधानिक प्राधिकरण द्वारा लिए गए फैसलों की समीक्षा के लिए माइक्रो-ऑब्जर्वर तैनात किए।

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसमें यह भी कहा गया है कि अन्य चुनाव आयुक्तों को केवल मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है। यह अनुच्छेद यह भी कहता है कि यह प्रक्रिया उस कानून के अधीन होगी जो संसद इस विषय पर बनाए। इसी के तहत संसद ने दिसंबर 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 पारित किया। इस कानून की धारा 11 में इस्तीफे और पद से हटाने की प्रक्रिया बताई गई है, जो मूल रूप से संविधान में बताए गए प्रावधानों का ही पालन करती है।

सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया

सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 124 और न्यायाधीश (जांच) कानून, 1968 के तहत तय है। अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, किसी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को तभी हटाया जा सकता है जब संसद के दोनों सदन इस संबंध में प्रस्ताव पारित करें और उस सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत इसके पक्ष में हो और यह प्रस्ताव सिद्ध दुराचार या अक्षमता के आधार पर हो। यदि दोनों सदन ऐसा प्रस्ताव पारित करते हैं, तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है और राष्ट्रपति आदेश जारी करके न्यायाधीश को पद से हटा सकते हैं।

जांच की प्रक्रिया

लोकसभा में प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। राज्यसभा में इसके लिए कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए होते हैं। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति यह तय करते हैं कि प्रस्ताव स्वीकार किया जाए या नहीं। यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो वे तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करते हैं। जिसमें सुप्रीम कोर्ट का एक न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ (ज्यूरिस्ट) शामिल होते हैं। यह समिति जांच कर अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देती है। यदि समिति न्यायाधीश को दुराचार या अक्षमता का दोषी पाती है, तो संसद में उस प्रस्ताव पर मतदान कराया जाता है। यदि संसद इसे पारित कर देती है, तो न्यायाधीश को हटाने के लिए प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है।

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