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समुद्र के भीतर तेल की तलाश में जुटा ONGC

ईरान संकट से ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करना सरकार की प्राथमिकता बना

अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध भड़कने के बाद एक बात पूरी दुनिया को समझ में आ गई है कि अब उन्हें अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए आउट ऑफ बॉक्स सोच की जरूरत है। इस युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा चर्चा का रुख निर्णायक रूप से आत्मनिर्भरता की ओर मोड़ दिया है। यूरोप, यूनाइटेड किंगडम और जापान जैसे देशों ने अपने घरेलू ऊर्जा स्रोतों को सुरक्षित करने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने चेतावनी दी है कि यह व्यवधान लंबा खिंच सकता है और संरचनात्मक रूप से नुकसान पहुंचा सकता है। आपूर्ति में कमी और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान का असर बाजारों पर संघर्ष खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक बना रह सकता है। इसी परिदृश्य में भारत भी ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में अपने प्रयास तेज कर रहा है। शायद यही हमारे लिए सबसे अच्छा विकल्प भी है। अधिक आक्रामक तरीके से ड्रिलिंग करने की मौजूदा पहल 2025 और 2026 की शुरुआत से ही गति पकड़ चुकी थी, जिसे अब भू-राजनीतिक दबावों ने और तेज कर दिया है। इस बदलाव का सबसे स्पष्ट संकेत ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) से मिला है, जिसकी हालिया पहल दिखाती है कि भारत अब केवल इरादों से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर क्रियान्वयन की दिशा में बढ़ रहा है। ओएनजीसी द्वारा लगभग 20 अरब डॉलर का वैश्विक टेंडर जारी कर गहरे समुद्र में ड्रिलिंग रिग्स किराए पर लेने का फैसला भारत की अपस्ट्रीम रणनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इस योजना का विशाल आकार और केवल 80 दिनों में रिग्स जुटाने की शर्त भारत के अन्वेषण इतिहास में शायद ही कभी देखी गई तत्परता को दर्शाती है। यह कार्यक्रम उत्पादन वाले और नए (फ्रंटियर) दोनों तरह के बेसिन को कवर करता है। ओएनजीसी कृष्णा-गोदावरी बेसिन में गतिविधि बढ़ा रहा है और साथ ही अंडमान के अल्ट्रा-डीपवॉटर क्षेत्रों में भी प्रवेश कर रहा है, जिन्हें लंबे समय से संभावनाशील लेकिन कम खोजे गए क्षेत्र माना जाता रहा है। बीपी, एक्सॉनमोबिल, टोटलएनर्जीज और पेट्रोब्रास जैसी वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी यह दर्शाती है कि भारत जटिल समुद्री क्षेत्रों में तेजी से परिणाम पाने के लिए तकनीक और विशेषज्ञता आयात करने को तैयार है। यह केवल ड्रिलिंग गतिविधि का विस्तार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक उछाल है। डीपवॉटर अन्वेषण महंगा और अनिश्चित होता है, लेकिन इसमें बड़े भंडार मिलने की संभावना होती है, जो भारत के ऊर्जा संतुलन को बदल सकती है। अरबों डॉलर का निवेश यह दिखाता है कि ऊर्जा सुरक्षा अब राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुकी है। इतना ही नहीं सरकार अब रसोई गैस (एलपीजी) पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए एथेनॉल बेस्ड कुकिंग स्टोव (चूल्हे) बनाने पर काम हो रहा है। हालांकि यह प्रोजेक्ट अभी बेहद शुरुआती चरण में है। एथेनॉल अत्यधिक ज्वलनशील होता है, इसलिए इसके चूल्हों में खास तरह के सेफ्टी वॉल्व और बर्नर डिजाइन किए जा रहे हैं। सोलर एनर्जी और इलेक्ट्रिक व्हीकल का इस्तेमाल बढ़ाना भी इस दिशा में अहम कदम हो सकता है। हालांकि इसमें भी समस्या सप्लाई चेन की ही है। हम ईवी के लिए अभी बड़े पैमाने पर चीन व अन्य देशों पर निर्भर हैं। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भता ही सर्वोत्तम विकल्प है। वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में जब दुनिया सप्लाई चेन के लिए एक दूसरे पर आश्रित हो गई है तो भी जरूरी है कि ऐसे स्रोतों का विविधिकरण करके किसी एक पर ही निर्भर न रहा जाए।

मिशन समुद्र मंथन और बढ़ती महत्वाकांक्षा

ONGC का यह टेंडर ‘मिशन समुद्र मंथन’ के व्यापक नीति ढांचे से जुड़ा है, जो भारत की नई डीपवॉटर अन्वेषण रणनीति है। यह मिशन ईरान युद्ध से पहले ही तैयार किया गया था और धीरे-धीरे होने वाले अन्वेषण से हटकर मिशन मोड में काम करने का संकेत देता है।

वर्तमान में भारत हर साल लगभग 30 अन्वेषण कुएं खोदता है। ‘समुद्र मंथन’ के तहत 2026-27 से अगले पांच वर्षों में यह संख्या बढ़ाकर कम से कम 100 कुएं प्रति वर्ष करने का लक्ष्य है। इनमें से लगभग 25 कुएं हर साल डीपवॉटर क्षेत्रों में होंगे, जबकि लगभग 40 कुएं भूगर्भीय अध्ययन को बेहतर बनाने पर केंद्रित होंगे। इसका मतलब है कि भारत सिर्फ ज्यादा नहीं, बल्कि बेहतर तरीके से ड्रिलिंग करना चाहता है।

दीर्घकालिक लक्ष्य भी काफी महत्वाकांक्षी हैं। अगले दो दशकों में हाइड्रोकार्बन भंडार में तेज वृद्धि का अनुमान है, जिससे कच्चे तेल और गैस का घरेलू उत्पादन बढ़ेगा। यदि इसमें आंशिक सफलता भी मिलती है, तो भारत की आयात पर निर्भरता कम होगी और बाहरी झटकों से सुरक्षा मिलेगी। इस लिहाज से ‘समुद्र मंथन’ केवल ऊर्जा कार्यक्रम नहीं, बल्कि आर्थिक जोखिम प्रबंधन की रणनीति भी है।

युद्ध से पहले शुरू हुआ रुझान

हालांकि ईरान युद्ध ने इस प्रक्रिया को तेज किया है, लेकिन भारत की ड्रिलिंग नीति पहले से ही गति पकड़ चुकी थी। 2025 में सरकार ने ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी के तहत अब तक का सबसे बड़ा दौर शुरू किया, जिसमें 13 बेसिन में 25 ब्लॉक ऑफर किए गए, जिनका अधिकांश हिस्सा समुद्री क्षेत्र में है।

नीतिगत सुधारों के जरिए पहले “नो-गो” माने जाने वाले क्षेत्रों को भी खोला गया है और कंपनियों को अधिक लचीलापन दिया गया है। जमीन पर भी गतिविधियां बढ़ी हैं—ONGC, ऑयल इंडिया और निजी कंपनियों के साथ कई अनुबंध हुए हैं, कोल बेड मीथेन और छोटे तेल क्षेत्रों की नीलामी की गई है, और केरल-कोंकण बेसिन जैसे क्षेत्रों में नई ड्रिलिंग योजनाएं शुरू की गई हैं।

भारतीय कंपनियों ने वैश्विक साझेदारियां भी बढ़ाई हैं, ताकि तकनीक और निवेश दोनों मिल सकें। ये सभी कदम दिखाते हैं कि भारत की मौजूदा ड्रिलिंग रणनीति कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सोची-समझी नीति का हिस्सा है।

ईरान युद्ध ने बढ़ाई रफ्तार

ईरान युद्ध ने केवल समयसीमा को छोटा किया है और दांव को बड़ा बना दिया है। भारत की आयातित तेल पर निर्भरता, खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील मार्गों पर, लंबे समय से एक कमजोरी मानी जाती रही है। वर्तमान संघर्ष ने इसे और स्पष्ट कर दिया है।

IEA की चेतावनी कि मध्य पूर्व में ऊर्जा ढांचे को हुए नुकसान के कारण संकट लंबा चल सकता है, यह संकेत देती है कि अस्थायी समाधान पर्याप्त नहीं होंगे। भारत के लिए इसका मतलब है कि आयात विविधीकरण से आगे बढ़कर घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना जरूरी है।

इसी वजह से महंगी होने के बावजूद डीपवॉटर ड्रिलिंग नीति के केंद्र में आ गई है। यह ऐसे भंडार तक पहुंच देती है जो अन्यथा अप्राप्य हैं और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।

भारत की रणनीति केवल अन्वेषण तक सीमित नहीं है। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को बढ़ाकर 90 दिन तक की आपूर्ति सुनिश्चित करने का लक्ष्य भी इसी दिशा में है। साथ ही, ड्रिलिंग उपकरणों के घरेलू निर्माण, नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में सुधार जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं।

जोखिम और आगे की राह

हालांकि आक्रामक समुद्री अन्वेषण में जोखिम भी हैं। डीपवॉटर ड्रिलिंग महंगी, तकनीकी रूप से जटिल और अनिश्चित होती है। ONGC की 20 अरब डॉलर की योजना इस महत्वाकांक्षा और वित्तीय प्रतिबद्धता दोनों को दर्शाती है।

फिर भी, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां बताती हैं कि निष्क्रियता का जोखिम इससे भी बड़ा हो सकता है। यूक्रेन और ईरान जैसे संघर्षों ने दिखाया है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति अब भू-राजनीतिक तनावों से गहराई से प्रभावित होती है।

भारत की मौजूदा रणनीति इसी वास्तविकता को स्वीकार करती है। अधिक ड्रिलिंग, गहराई तक खोज और घरेलू संसाधनों में निवेश—ये सब नई नीति नहीं, बल्कि पहले से चल रहे रुझान का तेज रूप हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसमें तात्कालिकता और गंभीरता दोनों बढ़ गई हैं।

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