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अब थोरियम से बनेगी बिजली

देश का पहला स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर शुरू हुआ

भारत उन कुछ देशों में से एक है जिनके पास परमाणु प्रौद्योगिकियों के विकास का लंबा अनुभव है। इसमें परमाणु ऊर्जा उत्पादन व प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्लूआर) तकनीक पर महारत भी शामिल है। ये ऐसे रिएक्टर हैं जो प्राकृतिक यूरेनियम को ईंधन के रूप में और हैवी वाटर (ड्यूटेरियम ऑक्साइड) को कूलेंट तथा मॉडरेटर के रूप में उपयोग करते हैं। भारत के मौजूद अधिकतर रिएक्टर ऐसे ही हैं। साथ ही कुछ आयातित लाइट वाटर रिएक्टर भी हैं। लेकिन, देश में कुछ अन्य परमाणु प्रौद्योगिकियां अभी विकासाधीन हैं। ये हैं फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (एफबीआर) यानी थोरियम-आधारित परमाणु रिएक्टर बनाना है। ये तकनीकें भारत के महत्वाकांक्षी तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का हिस्सा हैं। इससे भारत के प्रचुर थोरियम भंडार का उपयोग कर बिजली उत्पादन हो सकेगी। केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय एवं अंतर्देशीय प्लेसर रेत में तथा झारखंड और पश्चिम बंगाल की नदीय रेत में थोरियम व्यापक पैमाने पर मौजूद है। भारत के इस तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के महत्वपूर्ण दूसरे चरण को सोमवार को तब बढ़ावा मिला जब तमिलनाडु के कल्पक्कम स्थित देश के पहले स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने क्रिटिकलिटी हासिल की। क्रिटिकलिटी हासिल करने का अर्थ है एक स्व-स्थायी परमाणु विखंडन शृंखला प्रतिक्रिया की शुरुआत, जो अंततः 500 मेगावाट इलेक्ट्रिक क्षमता वाले इस रिएक्टर से बिजली उत्पादन की ओर ले जाएगी। क्रिटिकलिटी प्राप्त करना पूर्ण क्षमता से बिजली उत्पादन से पहले एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो दर्शाता है कि रिएक्टर का कोर डिज़ाइन के अनुसार कार्य कर रहा है और प्रत्येक विखंडन घटना पर्याप्त न्यूट्रॉन उत्पन्न कर रही है जिससे प्रतिक्रिया शृंखला जारी रह सके।

मोदी ने निर्णायक कदम बताया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर एक पोस्ट में इसे देश के नागरिक परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया और कहा कि यह स्वदेशी रूप से डिज़ाइन और निर्मित रिएक्टर हमारी वैज्ञानिक क्षमता की गहराई और हमारी इंजीनियरिंग क्षमता की मजबूती को दर्शाता है। उन्होंने इसे कार्यक्रम के तीसरे चरण के तहत भारत के थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

दो साल पहले शुरू हुई थी कोर लोडिंग

करीब दो वर्ष पहले मार्च 2024 में कल्पक्कम एफबीआर में ‘कोर लोडिंग’ यानी रिएक्टर के कोर में परमाणु ईंधन असेंबली स्थापित करने की प्रक्रिया पूरी हुई थी। यह रिएक्टर प्रारंभ में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (एमओएक्स) ईंधन का उपयोग करेगा, जिसके चारों ओर यूरेनियम (यू-238) की एक परत होगी, जो परमाणु रूपांतरण (न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन) के माध्यम से अधिक ईंधन उत्पन्न करेगी। इसी कारण इसे ‘ब्रीडर’ कहा जाता है।

यूरेनियम से ऊर्जा प्राप्ति 60 गुना करने क्षमता

पहला चरण पीएचडब्लूआर रिएक्टरों और संबंधित ईंधन चक्र सुविधाओं की स्थापना से संबंधित है, जो वर्तमान में प्रगति पर है। भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते ने भारत को अपने घरेलू रिएक्टरों के लिए यूरेनियम खरीदने का मार्ग खोल दिया था, जिससे कार्यक्रम की गति बढ़ी है। दूसरे चरण में एफबीआर रिएक्टरों को बड़े पैमाने पर तैनात किया जाएगा। ये रिएक्टर जितना ईंधन उपभोग करते हैं उससे अधिक उत्पन्न करने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। भारतीय संदर्भ में उच्च ‘ब्रीडिंग’ दर वांछित है ताकि ऊर्जा क्षमता तेजी से बढ़ सके। एफबीआर प्राकृतिक यूरेनियम से ऊर्जा प्राप्ति को 60 गुना तक बढ़ाने की क्षमता रखते हैं। ये रिएक्टर प्लूटोनियम के भंडार को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण हैं। जो पहले चरण के पीएचडब्लूआर से उत्पन्न होता है ताकि तीसरे चरण के लिए यूरेनियम-233 (यू-233) का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा सके। इसके लिए उचित समय पर एफबीआर में थोरियम (टीएच-232) को ब्लैंकेट सामग्री के रूप में उपयोग किया जाएगा, जिसे यू-233 में परिवर्तित किया जाएगा।

भारत का फास्ट रिएक्टर कार्यक्रम

भारत ने 1985 से 13.5 मेगावाट इलेक्ट्रिक क्षमता वाले फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) के साथ इस कार्यक्रम की शुरुआत की। अब 500 मेंगावाट इलेक्ट्रिक का प्रोटोटाइप एफबीआर कल्पक्कम में उन्नत कमीशनिंग चरण में है। इसके अलावा, फास्ट रिएक्टर फ्यूल साइकिल फैसिलिटी भी वहीं निर्माणाधीन है। आगे चलकर 600 मेगावाट इलेक्ट्रिसिटी क्षमता के छह और फास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाने की योजना है।

तीसरे चरण की ओर

भारत का उद्देश्य अंततः थोरियम को मुख्य ईंधन के रूप में उपयोग करना है। तीन-चरणीय प्रक्रिया में ‘फर्टाइल’ पदार्थों को ‘फिसाइल’ पदार्थों में परिवर्तित किया जाता है। उदाहरण के लिए यू-238 को प्लूटोनियम-239 (पीयू-239) में और थोरियम को यू-233 में बदला जाता है। भारत क्लोज्ड फ्यूल साइकिल अपनाता है, जिसमें उपयोग किए गए ईंधन को पुनःप्रसंस्कृत कर उपयोगी समस्थानिकों को अलग किया जाता है।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता होगी हासिल

एफबीआर को तीसरे चरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है, जिससे भारत अपने विशाल थोरियम संसाधनों का पूर्ण उपयोग कर सकेगा। परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोडकर के अनुसार, भारत में थोरियम-आधारित परमाणु ऊर्जा की ओर बढ़ना ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए अत्यंत आवश्यक है। अब आयातित यूरेनियम के साथ बड़े पैमाने पर पीएचडब्लूआर क्षमता विकसित करने के बाद, भारत थोरियम को फिसाइल यूरेनियम में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। इससे तीन-चरणीय कार्यक्रम के तीसरे थोरियम चरण को पहले शुरू करने की संभावना बनती है। पीएचडब्लूआर से प्राप्त प्रयुक्त ईंधन को पुनर्चक्रित कर नई ऊर्जा उत्पादन क्षमता विकसित की जा सकती है, जिसमें भविष्य की मोल्टन साल्ट रिएक्टर (एमएसआर) तकनीक भी शामिल है। इससे आयातित परमाणु ईंधन पर निर्भरता कम होगी और भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को गति मिलेगी।

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