
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक शिपिंग मार्ग लगातार बाधित हो रहे हैं। ऐसे में भारत के बासमती चावल किसानों और निर्यातकों ने फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अरब डेस्क से संपर्क कर सरकार से ‘फोर्स मेज्योर’ लागू करने की मांग की है। निर्यातकों का कहना है कि यह संकट सिर्फ लॉजिस्टिक समस्या नहीं बल्कि एक गंभीर व्यापारिक आपातस्थिति है, जिसमें शिपिंग कंपनियां उन परिस्थितियों के लिए उन पर अनुचित शुल्क डाल रही हैं, जो उनके नियंत्रण से बाहर हैं। उन्होंने सरकार से इन शुल्कों को माफ करने, मनमाने चार्ज रोकने और शिपिंग लाइनों को विवादित भुगतान से जोड़े बिना कंटेनर रिलीज़ या वापस करने का निर्देश देने की मांग की है। उनका कहना है कि यह संकट खासकर MSME सेक्टर पर भारी वित्तीय दबाव डाल रहा है और भारत की निर्यात साख को नुकसान पहुंचा सकता है।
‘फोर्स मेज्योर’ क्या है और निर्यातक क्या चाहते हैं?
‘फोर्स मेज्योर’ एक कानूनी सिद्धांत है, जो तब लागू होता है जब युद्ध, संघर्ष या बड़े व्यवधान जैसी अप्रत्याशित घटनाएं किसी अनुबंध को पूरा करना असंभव बना देती हैं। निर्यातकों का तर्क है कि फरवरी के अंत से चल रहा खाड़ी संकट इस श्रेणी में आता है—क्योंकि उन्होंने पहले ही ऑर्डर स्वीकार कर लिए थे, उत्पादन पूरा कर लिया था और कंटेनर लोड भी कर दिए थे।
वे ‘कॉन्ट्रैक्ट फ्रस्ट्रेशन’ के सिद्धांत का भी हवाला देते हैं, जिसके अनुसार यदि अनुबंध का पालन संभव नहीं रह जाता, तो वह स्वतः शून्य हो सकता है।
निर्यातकों की प्रमुख मांगें:
- 1 मार्च से इस स्थिति को औपचारिक रूप से ‘फोर्स मेज्योर’ घोषित किया जाए
- डिटेंशन, डेमरेज और स्टोरेज शुल्क तुरंत माफ किए जाएं
- युद्ध जोखिम (war risk) जैसे अतिरिक्त शुल्कों को पीछे की तारीख से लागू करने पर रोक लगे
- विवादित भुगतान से जोड़े बिना कंटेनर वापस या रिलीज़ किए जाएं
- सरकार, शिपिंग कंपनियों और उद्योग संगठनों के बीच एक संयुक्त टास्क फोर्स बनाई जाए
निर्यातकों का कहना है कि कानूनी कार्रवाई (लिटिगेशन) व्यावहारिक समाधान नहीं है, क्योंकि यह समय लेने वाली और महंगी प्रक्रिया है, जबकि संकट तुरंत समाधान की मांग करता है।
आर्थिक असर
इस संकट का वित्तीय असर गंभीर है:
- फंसे हुए माल में कार्यशील पूंजी (working capital) अटक गई है
- कृषि उत्पाद की गुणवत्ता खराब होने का खतरा है
- अनुबंध टूटने और प्रतिष्ठा को नुकसान का जोखिम बढ़ गया है
एक मामले में, एक निर्यातक को राहत की बार-बार मांग के बावजूद लगभग ₹30 लाख का बिल थमा दिया गया। MSME कंपनियां, जिनके पास ऐसे झटकों को झेलने की क्षमता कम होती है, सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं।
निर्यातकों ने इसे “राष्ट्रीय व्यापार संकट” बताया है और चेतावनी दी है कि यदि तुरंत सरकारी हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो इसका असर किसानों की आय, कृषि आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक बाजार में भारत की विश्वसनीयता पर पड़ेगा।
निर्यात कैसे प्रभावित हुआ?
मध्य पूर्व, जो भारतीय बासमती चावल का प्रमुख बाजार है, समुद्री मार्गों—खासकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य—में व्यवधान के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
जनवरी के अंत तक भारत लगभग 150 देशों को 5.4 मिलियन टन बासमती चावल निर्यात कर चुका था, और 2025–26 वित्त वर्ष के अंत तक लगभग 10 लाख टन और निर्यात होना था।
लेकिन फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के बाद लगभग 60,000 टन माल समुद्र में फंस गया। जहाजों की आवाजाही कम या बंद हो गई, ट्रांस-शिपमेंट ऑपरेशन घट गए और जेबेल अली बंदरगाह जैसे प्रमुख बंदरगाह प्रतिबंधों के तहत काम कर रहे हैं।
कई वैश्विक शिपिंग कंपनियों ने प्रभावित क्षेत्रों के लिए बुकिंग बंद कर दी है, जिससे ICD लुधियाना, ICD दादरी और मुंद्रा पोर्ट जैसे केंद्रों पर कंटेनर अटक गए हैं।
निर्यातकों का कहना है कि एक बार माल शिपिंग कंपनियों को सौंप देने के बाद उसकी जिम्मेदारी उन्हीं की होती है, और सेवा बंद होने से हुई देरी के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके बावजूद शिपिंग कंपनियां डिटेंशन, डेमरेज, स्टोरेज और युद्ध जोखिम शुल्क वसूल रही हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कंटेनर वापसी के लिए ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ जारी करने में देरी और संचार में ढिलाई से लागत और बढ़ रही है। उनका कहना है कि शिपिंग कंपनियां अपने फैसलों या बाहरी संकट से पैदा हुई स्थितियों के लिए शुल्क नहीं लगा सकतीं, और यह निर्यातकों के खर्च पर अनुचित लाभ कमाने जैसा है।



