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चार साल से युद्ध झेल रहे यूक्रेन के ठंड से ठिठुरते लोग भारत से अधिक खुश

वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में फिनलैंड फिर टॉप पर, यूक्रेन 111 वें और भारत 116 वे स्थान पर

भारी सोशल मीडिया उपयोग युवा लोगों के कल्याण (वेल-बीइंग) में तेज गिरावट ला रहा है और अंग्रेज़ी बोलने वाले देशों तथा पश्चिमी यूरोप की किशोर लड़कियाँ इससे सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं। यह जानकारी गुरुवार को जारी वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 में सामने आई है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वेलबीइंग रिसर्च सेंटर द्वारा प्रकाशित इस वार्षिक अध्ययन में यह भी पाया गया कि फिनलैंड लगातार नौवें साल दुनिया का सबसे खुशहाल देश बना हुआ है। अन्य नॉर्डिक देश—आइसलैंड, डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे—भी शीर्ष स्थानों पर बने हुए हैं। दूसरी ओर संघर्ष से प्रभावित देश सूची में सबसे नीचे हैं। अफगानिस्तान एक बार फिर सबसे कम खुशहाल देश है, उसके बाद सिएरा लियोन और मलावी का स्थान है। इसके बावजूद चार सालों से युद्ध झेल रहा देश यूक्रेन इस इंडेक्स में भारत से ऊपर है। हाल ही में अमेरिका ने भारी बर्फबारी में ठिठुरते यूक्रेनियों की हालत देखकर रूस से कुछ दिनों के लिए हमले बंद करने का आग्रह भी किया था। ऐसे में इस रिपोर्ट के तरीके को लेकर सवाल भी उठते हैं।

सबसे खुशहाल देश:

  1. फिनलैंड
  2. आइसलैंड
  3. डेनमार्क
  4. कोस्टा रिका
  5. स्वीडन
  6. नॉर्वे
  7. नीदरलैंड
  8. इजराइल
  9. लक्जमबर्ग
  10. स्विट्जरलैंड

सबसे कम खुशहाल देश:

  1. अफगानिस्तान
  2. सिएरा लियोन
  3. मलावी
  4. जिम्बाब्वे
  5. बोत्सवाना
  6. यमन
  7. लेबनान
  8. डीआर कांगो
  9. मिस्र
  10. तंज़ानिया

रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक दशक में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में 25 वर्ष से कम उम्र के लोगों की जीवन संतुष्टि में बड़ी गिरावट आई है, जिसमें सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग एक प्रमुख कारण है।

लगातार दूसरे साल भी कोई भी अंग्रेज़ी बोलने वाला देश शीर्ष 10 में शामिल नहीं है।
अमेरिका 23वें, कनाडा 25वें और ब्रिटेन 29वें स्थान पर है।

इस साल सबसे बड़ा उछाल कोस्टा रिका ने दिखाया, जो 2023 में 23वें स्थान से बढ़कर चौथे स्थान पर पहुँच गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका कारण मजबूत पारिवारिक संबंध और सामाजिक जुड़ाव है।

वेलबीइंग रिसर्च सेंटर के निदेशक और रिपोर्ट के सह-संपादक जान-इमैनुएल डी नेव ने कहा कि लैटिन अमेरिकी समाजों में सामाजिक रिश्ते मजबूत होते हैं और सामाजिक पूंजी का स्तर अधिक होता है।

रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्डिक देशों का लगातार शीर्ष पर बने रहना उनकी संपन्नता, समान संसाधन वितरण, मजबूत कल्याणकारी व्यवस्था और उच्च जीवन प्रत्याशा के कारण है।

भारत की रैंकिंग

147 देशों की सूची में भारत 116वें स्थान पर है, जो 2025 के 118वें स्थान से थोड़ा सुधार है।

भारत के आसपास की रैंकिंग इस प्रकार है:
111. यूक्रेन
112. मोरक्को
113. गिनी
114. माली
115. घाना
116. भारत
117. सोमालिया
118. युगांडा
119. जॉर्डन
120. मॉरिटानिया

यह रैंकिंग लगभग 140 देशों और क्षेत्रों के करीब 1 लाख लोगों के जवाबों पर आधारित है, जो गैलप और संयुक्त राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क के सहयोग से एकत्र किए गए। प्रतिभागियों से 0 से 10 के पैमाने पर अपने जीवन का मूल्यांकन करने को कहा गया।

सोशल मीडिया का प्रभाव

अंग्रेज़ी भाषी और पश्चिमी यूरोप के देशों में 25 वर्ष से कम उम्र के लोगों की औसत जीवन संतुष्टि पिछले दशक में लगभग एक अंक तक गिर गई है।
रिपोर्ट में पाया गया कि सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग विशेष रूप से किशोर लड़कियों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

उदाहरण के लिए, 15 वर्ष की वे लड़कियाँ जो रोज़ 5 घंटे या उससे अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताती हैं, उनकी जीवन संतुष्टि उन लड़कियों की तुलना में काफी कम होती है जो इसका कम उपयोग करती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जो युवा दिन में एक घंटे से कम सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं, उनका वेल-बीइंग सबसे अधिक पाया गया—यहाँ तक कि उन लोगों से भी ज्यादा जो बिल्कुल उपयोग नहीं करते।
हालाँकि, आज के किशोर औसतन 2.5 घंटे रोज़ सोशल मीडिया पर बिताते हैं।

डी नेव ने कहा, “यह साफ है कि हमें सोशल मीडिया में ‘सोशल’ तत्व को फिर से मजबूत करना होगा।”

क्षेत्रीय अंतर और निष्कर्ष

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मध्य पूर्व और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सोशल मीडिया का उपयोग वेल-बीइंग के साथ अधिक सकारात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, और भारी उपयोग के बावजूद युवाओं की संतुष्टि स्थिर बनी हुई है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, प्लेटफॉर्म का डिजाइन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एल्गोरिदम आधारित, इमेज-प्रधान प्लेटफॉर्म—जहाँ इन्फ्लुएंसर्स पर ज़ोर होता है—लोगों में तुलना की भावना बढ़ाकर वेल-बीइंग को खराब करते हैं, जबकि संवाद-आधारित प्लेटफॉर्म बेहतर परिणाम देते हैं।

ये निष्कर्ष ऐसे समय में आए हैं जब दुनियाभर में नाबालिगों के बीच सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने को लेकर बहस तेज हो रही है, और कई देश इस पर प्रतिबंध लगाने या नियम बनाने पर विचार कर रहे हैं।

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