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ममता पर चला सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा

माल्दा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने से न्यायालय नाराज

ममता ने इस बार वह गलती कर दी, जो उन्हें नहीं करनी चाहिए थी। उन्होंने सीधे सुप्रीम कोर्ट से पंगा ले लिया। वह लोगों को बहका सकती हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उनकी झूठी दलीलों को मानने वाला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एक सरकारी कार्यालय में सात न्यायिक अधिकारियों को भीड़ द्वारा घेरकर (घेराव कर), उन्हें नौ घंटे से अधिक समय तक बिना भोजन और पानी के बंद रखना न केवल उन्हें डराने-धमकाने का “साहसिक प्रयास” था, बल्कि यह शीर्ष अदालत के अधिकार को चुनौती देने जैसा भी है।

अदालत ने बताया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों की आपत्तियों का निपटारा करने के लिए सैकड़ों न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चुनाव पंजीकरण अधिकारी के रूप में तैनात किया गया है। यह प्रक्रिया 23 और 29 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले की जा रही है।

अदालत ने यह भी कहा कि तीन न्यायिक अधिकारी महिलाएं थीं और यह घटना पश्चिम बंगाल में नागरिक और पुलिस प्रशासन की “पूरी विफलता” को दर्शाती है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant), जो तीन जजों की पीठ की अध्यक्षता कर रहे थे, ने सवाल उठाया कि इतने लंबे समय तक कैद के दौरान राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे — क्या वे मौके पर जाकर स्थिति को शांत नहीं कर सकते थे?

अदालत ने यह भी कहा कि जब अंततः पुलिस ने अधिकारियों को रात देर से बाहर निकाला, तब उन पर पत्थरबाजी की गई। उन्हें बुधवार दोपहर 3:30 बजे से आधी रात के बाद तक रोके रखा गया।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा,
“यह कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह पहली नजर में एक सोची-समझी और योजनाबद्ध कोशिश थी, जिसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों का मनोबल तोड़ना और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया को प्रभावित करना था। हम किसी को भी कानून हाथ में लेने और न्यायिक अधिकारियों के मन में डर पैदा करने की अनुमति नहीं देंगे। यह स्पष्ट रूप से आपराधिक अवमानना (Contempt of Court) है।”

उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने “पश्चिम बंगाल जैसा राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत राज्य पहले कभी नहीं देखा।”


अदालत की अवमानना (Contempt of Court)

न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के राजनीतिक नेताओं को एक स्वर में इस घटना की निंदा करनी चाहिए। उन्होंने कहा,
“न्यायिक अधिकारियों के आदेश इस अदालत के आदेश माने जाते हैं। यह घटना पूरे प्रयास को बाधित करने और अधिकारियों को हतोत्साहित करने की कोशिश थी। यह अदालत की अवमानना है।”


जांच के आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि इस मामले की जांच CBI या NIA से कराई जाए। साथ ही न्यायिक अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बल तैनात करने को कहा।

पीठ ने बताया कि कलकत्ता हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय पुलिस और प्रशासन से मदद मांगी थी, लेकिन रात 8:30 बजे तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

इसके बाद गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से संपर्क किया गया। अंततः हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा, जिसके बाद आधी रात को गृह सचिव और DGP उनके निवास पहुंचे।


प्रशासन पर सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्य सचिव, गृह सचिव, DGP, जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने इस संकट के दौरान “बेहद निंदनीय” तरीके से काम किया।

अदालत ने DGP, मालदा के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी।

अदालत ने कहा कि अधिकारियों को यह बताना होगा कि उन्होंने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए।


राज्य सरकार का पक्ष

वरिष्ठ अधिवक्ताओं कल्याण बंदोपाध्याय, मेनका गुरुस्वामी और गोपाल शंकरनारायणन, जो राज्य सरकार और तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ने कहा कि मुख्य सचिव और DGP की नियुक्ति मार्च में चुनाव आयोग द्वारा की गई थी।

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