लोकरंगसमाचारलोक

आरएसएस के पंजीकरण पर फिर छिड़ी बहस: लेकिन कानूनन रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं

खड़गे या तो नियम नहीं जानते या वे जानबूझकर चर्चा में बने रहना चाहते हैं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की कानूनी स्थिति एक बार फिर राजनीतिक विवाद का विषय बन गई है। कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने सवाल उठाया है कि देश के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में कार्य करने वाला आरएसएस आज तक बिना पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) के कैसे काम कर रहा है। उन्होंने संगठन की फंडिंग, कर (टैक्स) अनुपालन और ऑडिट की आवश्यकता पर भी प्रश्न उठाए।

इसके जवाब में आरएसएस ने अपना वही पुराना तर्क दोहराया, जिसे वह दशकों से देता आ रहा है—कानून के तहत उसका पंजीकरण अनिवार्य नहीं है और उसकी वैधता को अदालतों तथा सरकारों ने कई बार स्वीकार किया है।

पिछले वर्ष 9 नवंबर को बेंगलुरु में आयोजित एक व्याख्यानमाला में, जब इसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया मांगी गई थी, तब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इस विवाद को पहले से ही सुलझा हुआ विषय बताया था।

उन्होंने कहा,
“आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी। क्या आप चाहते हैं कि हम उस ब्रिटिश सरकार के पास जाकर अपना पंजीकरण कराते, जिसके खिलाफ हमारे सरसंघचालक संघर्ष कर रहे थे?”

भागवत का कहना था कि भारतीय कानून व्यक्तियों के संगठनों (Associations of Individuals) के लिए पंजीकरण अनिवार्य नहीं बनाता। उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस को कानूनी रूप से “बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स” (व्यक्तियों का समूह) के रूप में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने कर संबंधी मामलों में आए अदालतों के फैसलों, संगठन पर तीन बार लगे प्रतिबंधों तथा संसद और विधानसभाओं में आरएसएस के बार-बार उल्लेख को उसकी कानूनी मान्यता का प्रमाण बताया।

फिर भी सवाल क्यों उठता है?

यह विवाद इसलिए बार-बार सामने आता है क्योंकि आरएसएस भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक अनूठा स्थान रखता है। यह संभवतः देश का सबसे बड़ा स्वैच्छिक संगठन है, जो लगभग 100 वर्षों से अस्तित्व में है। इसके हजारों दैनिक शाखाएँ संचालित होती हैं और इसके प्रभाव क्षेत्र में श्रमिक संगठन, किसान संगठन, छात्र संगठन, शैक्षणिक संस्थान तथा सामाजिक सेवा से जुड़े अनेक संगठन शामिल हैं।

इसका राजनीतिक सहयोगी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पिछले एक दशक से केंद्र की सत्ता में है और देश के अधिकांश राज्यों में भी उसकी सरकारें हैं।

इसके बावजूद, इतने बड़े स्तर पर काम करने वाले अधिकांश संगठनों के विपरीत, आरएसएस स्वयं आज भी अपंजीकृत (Unregistered) है।

13 जून को लिखे अपने पत्र में प्रियंक खरगे ने कहा,

“इसी व्यापक प्रभाव, आकार और पहुंच के कारण आरएसएस से पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक अनुपालन के सर्वोच्च मानकों का पालन करने की अपेक्षा की जानी चाहिए।”

क्या पंजीकरण अनिवार्य है?

नहीं।

भारत में ऐसा कोई सामान्य कानून नहीं है जो प्रत्येक नागरिक संगठन के लिए पंजीकरण अनिवार्य बनाता हो।

सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, ट्रस्ट एक्ट, कंपनी कानून और ट्रेड यूनियन कानून संगठनों को कानूनी रूप देने के विकल्प प्रदान करते हैं, लेकिन जब तक किसी विशेष कानूनी अधिकार या सुविधा की आवश्यकता न हो, तब तक पंजीकरण सामान्यतः वैकल्पिक होता है।

यही आधार मोहन भागवत के तर्क का भी है।

अदालतों ने क्या कहा?

1970 के दशक में मुंबई और पटना में दो कर (टैक्स) मामलों के दौरान पहली बार आरएसएस की कानूनी स्थिति पर प्रश्न उठा।

आयकर विभाग ने स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली ‘गुरु दक्षिणा’ पर कर लगाने का प्रयास किया था। हालांकि, कर अपीलीय अधिकारियों ने दोनों मामलों में निर्णय दिया कि नियमों के अनुसार गुरु दक्षिणा करमुक्त है।

बाद में 1994 में पटना हाईकोर्ट ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा।

इन्हीं मामलों के दौरान आरएसएस को “बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स” के रूप में मान्यता भी मिली।

इसलिए विवाद इस बात पर नहीं है कि आरएसएस कानूनी है या नहीं, बल्कि इस बात पर है कि इतने बड़े और प्रभावशाली संगठन को क्या आधुनिक संस्थाओं की तरह पंजीकरण कराना चाहिए?

अधिकांश संगठन पंजीकरण क्यों कराते हैं?

पंजीकरण से किसी संगठन को एक स्पष्ट कानूनी पहचान मिलती है। इसके माध्यम से संगठन—

  • अपने नाम पर संपत्ति रख सकता है।
  • बैंक खाते खोल सकता है।
  • अनुबंध कर सकता है।
  • कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकता है।
  • अनुदान और दान प्राप्त कर सकता है।
  • अपनी संपत्तियों का कानूनी प्रबंधन कर सकता है।

इसके अलावा पंजीकरण संगठन की प्रशासनिक संरचना, निरंतरता और जवाबदेही भी सुनिश्चित करता है।

इसके विपरीत, अपंजीकृत संगठनों में संपत्ति अक्सर ट्रस्टियों या पदाधिकारियों के नाम पर होती है तथा कानूनी कार्यवाही भी व्यक्तियों के माध्यम से ही करनी पड़ती है।

संगठन से पहले एक सामाजिक आंदोलन

1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित आरएसएस को एक पारंपरिक संस्था के बजाय चरित्र निर्माण और सामाजिक संगठन के आंदोलन के रूप में विकसित किया गया था।

राजनीतिक दलों या ट्रेड यूनियनों की तरह इसमें सदस्यता फॉर्म, फीस या औपचारिक नामांकन की व्यवस्था नहीं रखी गई।

आज भी—

  • कोई सदस्यता कार्ड नहीं है।
  • राष्ट्रीय स्तर की सार्वजनिक सदस्य सूची नहीं है।
  • नियमित शाखाओं में भाग लेने वाला व्यक्ति स्वयंसेवक माना जाता है।

आरएसएस के इतिहासकार रतन शारदा के अनुसार,

“आरएसएस पारंपरिक संगठन नहीं है। यह व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़ने वाला चरित्र निर्माण का संगठन है। कोई भी शाखा शुरू कर सकता है और बंद भी कर सकता है।”

उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस पूरी तरह विकेंद्रीकृत (Decentralised) है।

“हर शाखा अपने संसाधन स्वयं जुटाती है। इसलिए कोई केंद्रीय रिकॉर्ड नहीं रखा जाता।”

सरकारी कार्रवाई का डर

केवल संगठनात्मक दर्शन ही इसकी वजह नहीं है।

शोधकर्ताओं वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने अपनी 2019 की पुस्तक ‘द ब्रदरहुड इन सैफ्रन’ में लिखा है कि आरएसएस ने शुरुआत से ही सरकार के साथ टकराव से बचने की नीति अपनाई ताकि उस पर प्रतिबंध लगाने की संभावना कम रहे।

यह आशंका निराधार भी नहीं थी।

आरएसएस पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया—

  • 1948 : महात्मा गांधी की हत्या के बाद।
  • 1975 : आपातकाल के दौरान।
  • 1992 : बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद।

इन घटनाओं के बाद आरएसएस ने अपने संचालन को अधिक अनौपचारिक बनाए रखा, कम से कम लिखित रिकॉर्ड रखे और विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग सहयोगी संगठनों का गठन किया।

एक आरएसएस पदाधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा,

“आपातकाल के दौरान स्वयंसेवकों की अनौपचारिक सूचियों के आधार पर भी गिरफ्तारियां हुई थीं। आज कागजों में आरएसएस का कोई कार्यालय नहीं है, इसलिए उस पर छापा मारना या सदस्यों की सूची के आधार पर कार्रवाई करना आसान नहीं है।”

आरएसएस से जुड़े अधिकांश संगठन पंजीकृत हैं

यही कारण है कि आरएसएस से जुड़े अधिकांश बड़े संगठन कानूनी रूप से पंजीकृत हैं।

  • भारतीय मजदूर संघ (BMS) ट्रेड यूनियन कानून के तहत कार्य करता है।
  • शिक्षा, सामाजिक सेवा और जनजातीय कल्याण से जुड़े अधिकांश संगठन ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत हैं।

रतन शारदा के अनुसार,

“आरएसएस स्वयं अनौपचारिक संगठन है, लेकिन उसके सहयोगी संगठन पंजीकृत हैं, आयकर चुकाते हैं, उनका ऑडिट होता है और वे अपनी वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं।”

दिल्ली में हाल ही में बने आरएसएस मुख्यालय का स्वामित्व भी सीधे आरएसएस के पास नहीं बल्कि अलग ट्रस्टों के माध्यम से है।

1949 में संविधान अपनाया

महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध को हटवाने के लिए आरएसएस ने 1949 में पहली बार अपना लिखित संविधान स्वीकार किया।

हालांकि उस समय सरकार ने भी संगठन को पंजीकृत कराने की कोई शर्त नहीं रखी।

इसके बावजूद आरएसएस ने अपने अनौपचारिक ढांचे को काफी हद तक बनाए रखा।

क्या आरएसएस अकेला ऐसा संगठन है?

भारत में कई धार्मिक समुदाय, अखाड़े, संप्रदाय और सामाजिक आंदोलन बिना पंजीकरण के भी कार्य करते हैं।

लेकिन ऐसी संस्थाएं बहुत कम हैं जो—

  • लगभग 100 वर्ष पुरानी हों,
  • पूरे देश में सक्रिय हों,
  • अनुशासित संगठनात्मक ढांचा रखती हों,
  • लाखों स्वयंसेवकों से जुड़ी हों,
  • और जिनका राजनीतिक प्रभाव इतना व्यापक हो।

यही कारण है कि आरएसएस की वैधता पर नहीं, बल्कि उसके पंजीकरण की आवश्यकता पर समय-समय पर बहस दोबारा शुरू हो जाती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button