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नागरिकता एक कानूनी स्थिति है, कोई दस्तावेज नहीं

पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं? विदेश मंत्रालय की सफाई के बाद उठे सवाल

विदेश मंत्रालय ने बुधवार को पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है और इसे अपने आप में नागरिकता के अंतिम प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस बयान के बाद व्यापक भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। अधिकांश भारतीयों के लिए पासपोर्ट सरकार द्वारा जारी सबसे अधिक विश्वसनीय दस्तावेज माना जाता है। इस पर भारत गणराज्य का नाम अंकित होता है, इसे दुनिया भर में स्वीकार किया जाता है और यह सरकारी सत्यापन के बाद ही जारी किया जाता है। हालांकि, विदेश मंत्रालय की यह सफाई एक लंबे समय से स्थापित कानूनी स्थिति को दर्शाती है। सरकार किसी व्यक्ति को पासपोर्ट इसलिए जारी करती है क्योंकि वह संतुष्ट होती है कि वह भारतीय नागरिक है, लेकिन पासपोर्ट स्वयं नागरिकता प्रदान नहीं करता और न ही किसी कानूनी विवाद की स्थिति में नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण माना जाता है।

सवाल: फिर नागरिकता का प्रमाण क्या है?

जवाब: नागरिकता एक कानूनी स्थिति है, कोई दस्तावेज नहीं

संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और नागरिकता अधिनियम, 1955 यह निर्धारित करते हैं कि भारतीय नागरिक कौन है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से कोई भी प्रावधान किसी एक दस्तावेज को नागरिकता का प्रमाण नहीं मानता। नागरिकता को एक कानूनी स्थिति माना गया है, जो जन्म, वंश, निवास (डोमिसाइल) या न्यूट्रलाइजेशन जैसे तथ्यों से उत्पन्न होती है।

उदाहरण : भारत में जन्मे व्यक्ति की नागरिकता उसके जन्म की तारीख और कुछ मामलों में उसके माता-पिता की नागरिकता पर निर्भर करती है। वहीं न्यूट्रलाइजेशन के माध्यम से नागरिकता प्राप्त करने वाले व्यक्ति के लिए वैधानिक शर्तों का पालन आवश्यक होता है। हालांकि, नागरिकता नियम, 2003 के तहत कुछ मामलों में भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने वालों को यह साबित करने के लिए अपने माता-पिता के पासपोर्ट की प्रतियां देनी होती हैं कि वे भारतीय नागरिक हैं।

सवाल : पासपोर्ट महत्वपूर्ण क्यों है, लेकिन अंतिम प्रमाण क्यों नहीं?

चूंकि पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है और विदेशों में इसे मान्यता प्राप्त है, इसलिए व्यवहारिक रूप से यह किसी व्यक्ति के भारतीय नागरिक होने का सबसे मजबूत प्रमाण माना जाता है। लेकिन कानूनी दृष्टि से इसकी स्थिति जटिल है। पासपोर्ट अधिनियम की धारा 20 केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि यदि जनहित में आवश्यक हो तो वह किसी गैर-भारतीय नागरिक को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है। यदि भारतीय मूल का कोई व्यक्ति भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण राज्यविहीन हो जाए या भारत में मौजूद कोई व्यक्ति राज्यविहीन हो लेकिन उसे विदेश यात्रा करनी हो। भारत ने तिब्बती शरणार्थियों और श्रीलंकाई तमिल शरणार्थियों को विदेश यात्रा के लिए विशेष यात्रा दस्तावेज जारी किए हैं।

अन्य लोकतंत्रों में भी यही व्यवस्था

ब्रिटेन और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी पासपोर्ट नागरिकता का निर्माण नहीं करता। वहां पासपोर्ट तब जारी किया जाता है जब सरकार पहले ही यह तय कर चुकी होती है कि व्यक्ति नागरिक है। अंतर यह है कि इन देशों में नागरिक पंजीकरण प्रणाली अधिक मजबूत है और न्यूट्रलाइजेशन के माध्यम से नागरिकता प्राप्त करने वालों को औपचारिक नागरिकता प्रमाणपत्र जारी किए जाते हैं, जिन्हें नागरिकता का प्राथमिक कानूनी प्रमाण माना जाता है।

पासपोर्ट विवाद ने भारत की नागरिकता व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने ला दिया है। भारत के पास नागरिकता निर्धारित करने के लिए विस्तृत कानून हैं, लेकिन अधिकांश नागरिकों के पास ऐसा कोई एक दस्तावेज नहीं है जो निर्णायक रूप से उनकी नागरिकता सिद्ध कर सके। यही कारण है कि कानूनी रूप से पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी या जन्म प्रमाणपत्र में से कोई भी अकेले नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता। नागरिकता अंततः एक कानूनी स्थिति है, जिसे विभिन्न तथ्यों और दस्तावेजों के समग्र मूल्यांकन के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

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