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पेपर लीक नहीं, महंगी शिक्षा है जेन-जी की सबसे बड़ी चुनौती

पेपर लीक के खिलाफ चले आंदोलन का अंत हो गया। सरकार ने अपनी ओर से कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। पेपर लीक करने वालों के खिलाफ कठोर कानून बनाया गया, संसद से उसे पारित कराया गया और यह भी घोषणा हुई कि अगले वर्ष से नीट परीक्षा कंप्यूटर आधारित होगी ताकि पारदर्शिता और सुरक्षा बढ़ाई जा सके।

ये सभी कदम आवश्यक थे। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य है। लेकिन क्या इससे उस पीढ़ी की सबसे बड़ी चिंता समाप्त हो जाएगी, जिसने सड़कों पर उतरकर अपना भविष्य सुरक्षित करने की मांग की थी?

शायद नहीं।

क्योंकि पेपर लीक समस्या है, लेकिन शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या नहीं। असली संकट यह है कि गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा धीरे-धीरे एक महंगी वस्तु बनती जा रही है, जिसे खरीदने की क्षमता हर परिवार के पास नहीं है।

आज यदि कोई छात्र पूरी ईमानदारी से परीक्षा पास भी कर ले, तो उसके सामने दूसरा सवाल खड़ा हो जाता है—क्या उसका परिवार फीस भर पाएगा?

यही वह प्रश्न है, जिस पर न आंदोलन में गंभीर चर्चा हुई और न ही सरकार की प्रतिक्रिया में।

निजीकरण ने तस्वीर बदल दी

पिछले दो दशकों में भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था का चेहरा तेजी से बदला है। उच्च शिक्षा मंत्रालय के ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) के अनुसार, देश में लगभग 80 प्रतिशत कॉलेज निजी प्रबंधन के अधीन हैं और कॉलेजों में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी इन्हीं संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। सरकारी विश्वविद्यालय और कॉलेज अब भी प्रतिष्ठा के केंद्र हैं, लेकिन उनकी संख्या और सीटें मांग के मुकाबले बहुत कम हैं।

2004 के बाद उच्च शिक्षा के विस्तार का सबसे आसान रास्ता निजी निवेश को माना गया। नई इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और प्रोफेशनल संस्थाओं की बड़ी संख्या निजी क्षेत्र में खुली। इससे सीटें बढ़ीं, लेकिन शिक्षा की लागत भी लगातार बढ़ती चली गई।

आज स्थिति यह है कि अनेक निजी मेडिकल कॉलेजों में एक वर्ष की फीस 20 से 30 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। कई निजी इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट संस्थानों में चार साल की पढ़ाई पर 15 से 25 लाख रुपये या उससे अधिक खर्च आता है। हॉस्टल, किताबें और अन्य शुल्क जोड़ दें तो यह राशि कई परिवारों की जीवनभर की बचत के बराबर हो जाती है।

रियायतें सार्वजनिक, शुल्क निजी

सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं दिखाई देता है।

देश के अधिकांश निजी शिक्षा संस्थान ट्रस्ट, सोसायटी या सेक्शन-8 संस्थाओं के रूप में पंजीकृत हैं। उन्हें आयकर में छूट मिलती है। अनेक राज्यों में रियायती दरों पर सरकारी जमीन उपलब्ध कराई जाती है। कई प्रकार की स्थानीय कर रियायतें और अन्य सुविधाएं भी दी जाती हैं।

यानी सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करके निजी संस्थानों को खड़ा किया जाता है।

लेकिन जब छात्र प्रवेश लेने पहुंचता है, तो उसे बाजार आधारित फीस चुकानी पड़ती है।

यदि किसी संस्था को समाज और सरकार दोनों से विशेष सुविधाएं मिल रही हैं, तो क्या उस पर यह जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए कि उसकी फीस भी सामाजिक रूप से न्यायसंगत हो?

मध्यम वर्ग सबसे बड़ा पीड़ित

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान गरीबों से अधिक मध्यम वर्ग उठा रहा है।

गरीबों के लिए कुछ सरकारी छात्रवृत्तियां और आरक्षण योजनाएं उपलब्ध हैं। संपन्न वर्ग फीस देने में सक्षम है। लेकिन मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा न तो सरकारी सहायता का पात्र होता है और न ही लाखों रुपये की फीस आसानी से दे सकता है।

इसी कारण शिक्षा ऋण का आकार लगातार बढ़ा है। भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में शिक्षा ऋण में फिर से उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका अर्थ है कि लाखों युवा अपने करियर की शुरुआत ही कर्ज के साथ कर रहे हैं।

क्या शिक्षा भी स्वास्थ्य जैसी हो रही है?

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र का अनुभव हमारे सामने है। सरकारी अस्पतालों की सीमित क्षमता के कारण निजी अस्पताल तेजी से बढ़े और इलाज महंगा होता गया।

क्या उच्च शिक्षा भी उसी रास्ते पर चल रही है?

यदि गुणवत्तापूर्ण सरकारी संस्थानों की संख्या पर्याप्त नहीं होगी, तो निजी संस्थानों के पास फीस बढ़ाने की शक्ति स्वाभाविक रूप से बढ़ती जाएगी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने क्या छोड़ा?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने बहुविषयक शिक्षा, शोध, लचीलापन और संस्थागत सुधारों पर जोर दिया। यह स्वागत योग्य है।

लेकिन नीति में एक बड़ा प्रश्न अपेक्षाकृत अस्पष्ट रहा—निजी शिक्षा की बढ़ती लागत को कैसे नियंत्रित किया जाएगा?

यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कीमत लगातार बढ़ती रही, तो नई शिक्षा नीति का लाभ भी सीमित वर्ग तक सिमट सकता है।

अब बहस का केंद्र बदलना होगा

यदि सरकार वास्तव में जेन-जी की चिंता दूर करना चाहती है, तो अगला सुधार परीक्षा प्रणाली नहीं बल्कि शिक्षा की लागत पर होना चाहिए।

इसके लिए कुछ साहसिक कदम उठाए जा सकते हैं—

  • जिन निजी संस्थानों को सरकारी जमीन, कर छूट या अन्य सार्वजनिक रियायतें मिलती हैं, उनके लिए स्वतंत्र फीस नियामक आयोग बनाया जाए।
  • सभी निजी कॉलेजों को अपनी कॉस्ट शीट, फीस संरचना और ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए।
  • सरकारी सहायता पाने वाले संस्थानों में कम-से-कम 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति के साथ आरक्षित की जा सकती हैं।
  • अगले दस वर्षों में केंद्र और राज्य मिलकर सरकारी मेडिकल, इंजीनियरिंग और सामान्य डिग्री कॉलेजों की सीटों में बड़े पैमाने पर वृद्धि करें।
  • CSR के तहत उद्योगों को विद्यालयों के बजाय उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया जाए।
  • विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में केवल शोध और प्लेसमेंट नहीं, बल्कि ‘Affordability Index’ (सुलभता सूचकांक) भी शामिल किया जाए। जो संस्थान कम लागत में बेहतर शिक्षा दें, उन्हें अतिरिक्त प्रोत्साहन मिले।

युवाओं का सवाल बदल चुका है

आज का युवा केवल यह नहीं पूछ रहा कि परीक्षा निष्पक्ष होगी या नहीं।

वह यह भी पूछ रहा है कि यदि वह मेहनत करके सफल हो जाए, तो क्या उसका परिवार उसकी पढ़ाई का खर्च उठा पाएगा?

यही प्रश्न भारत की सामाजिक गतिशीलता का भविष्य तय करेगा।

पेपर लीक पर कठोर कानून बनाना आवश्यक था। लेकिन यदि उच्च शिक्षा धीरे-धीरे केवल संपन्न वर्ग की पहुंच में सिमटती गई, तो यह प्रतिभा की नहीं, आर्थिक क्षमता की प्रतियोगिता बन जाएगी।

जेन-जी को केवल निष्पक्ष परीक्षा नहीं चाहिए; उसे निष्पक्ष अवसर चाहिए।

और निष्पक्ष अवसर की शुरुआत उस दिन होगी, जब किसी छात्र का भविष्य उसकी योग्यता से तय होगा, न कि उसके माता-पिता के बैंक खाते से।

मुझे लगता है कि इस विषय में एक और पहलू जोड़ना चाहिए, जो अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है—सरकार हर साल उच्च शिक्षा पर कितना खर्च करती है और उसके मुकाबले टैक्स छूट व सार्वजनिक संसाधनों का लाभ लेने वाले निजी संस्थानों से समाज को कितना प्रतिफल मिलता है। यह आर्थिक तुलना संपादकीय को और अधिक प्रभावशाली बना सकती है।

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