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राहुल गांधी : राजनीति में तपस्या या परफॉर्मेंस?

राहुल का छाता होने के बावजूद बारिश भीगना व भारी ठंड में टीशर्ट पहनना आखिर क्या है?

राजनीति में कुछ नेता भाषण देते हैं, कुछ नेता विचार देते हैं और कुछ नेता अपनी एक छवि गढ़ते हैं। राहुल गांधी की राजनीति में तीसरी चीज सबसे ज्यादा दिखाई देती है। कभी टी-शर्ट उनका राजनीतिक बयान बन जाती है, कभी पैदल यात्रा, कभी किसी बच्चे को गले लगाना, कभी किसान के घर बैठना और कभी यह घोषणा कि उन्होंने ‘राहुल गांधी’ को ही मार दिया है। सवाल यह नहीं कि इनमें से कौन-सा दृश्य अच्छा है और कौन-सा बुरा। असली सवाल यह है कि क्या राजनीति विचार और नीति से चल रही है या लगातार बनतीबिगड़ती एक राजनीतिक परफॉर्मेंस से?

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी का कड़ाके की ठंड में टी-शर्ट पहनकर चलना देश की राजनीति का बड़ा दृश्य बन गया था। इसे उन्होंने गरीब बच्चों के प्रति संवेदना से जोड़ा। तर्क भावनात्मक था और स्वाभाविक रूप से सुर्खियां भी बनीं। लेकिन राजनीति में प्रतीक तभी ताकतवर बनता है जब उसके पीछे ठोस राजनीतिक विचार भी हो। वरना वह धीरे-धीरे राजनीति से ज्यादा विज्ञापन की भाषा बोलने लगता है।

आज राहुल गांधी की सफेद टी-शर्ट एक तरह का राजनीतिक ब्रांड बन चुकी है। यह सादगी का प्रतीक है या सादगी का प्रदर्शन—इसका फैसला जनता करे। लेकिन यह जरूर पूछा जा सकता है कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के प्रमुख चेहरे को अपनी राजनीतिक पहचान के लिए कपड़े, यात्रा और शारीरिक सहनशीलता के प्रतीकों पर इतना निर्भर क्यों होना पड़ रहा है?

फिर आता है ‘तपस्वी’ वाला राहुल गांधी। राजनीति में तपस्या की भाषा नई नहीं है। गांधी ने भी तपस्या, त्याग और आत्मसंयम को राजनीतिक हथियार बनाया था। फर्क यह है कि गांधी की तपस्या का संबंध एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन से था। उनके जीवन की सादगी उनके विचारों का परिणाम थी। आज जब कोई नेता स्वयं को तपस्वी कहता है तो स्वाभाविक सवाल उठता है—तपस्या किसके लिए और परिणाम क्या?

‘मैंने राहुल गांधी को मार दिया’ जैसी पंक्ति भी इसी राजनीतिक आत्मकथा का हिस्सा है। इसे मानसिक विचलन कहना जल्दबाजी होगी। यह एक रूपक हो सकता है—पुराने राहुल गांधी को खत्म करके नए राहुल गांधी के जन्म का। लेकिन यहां भी राजनीति का एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। देश को नेता की आत्मकथा से ज्यादा अपनी समस्याओं की कथा सुननी है। जनता यह जानना चाहती है कि उसके बच्चे को नौकरी कब मिलेगी, शिक्षा क्यों महंगी होती जा रही है, किसान की आय क्यों अटकी है और अर्थव्यवस्था में नए अवसर कहां बन रहे हैं।

यहीं राहुल गांधी की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है।

उनके भाषणों में कई बार ऐसे तर्क और उदाहरण आ जाते हैं जिन पर राजनीतिक विरोधी ही नहीं, सामान्य श्रोता भी सवाल उठाते हैं। तकनीकी विषयों पर गलत या अधूरी जानकारी, आर्थिक मुद्दों पर अतिरंजित दावे और कभी-कभी ऐसे निष्कर्ष जिनका आधार स्वयं भाषण में स्पष्ट नहीं होता। नेता से गलती हो सकती है। लेकिन लगातार गलती के बाद सुधार न होना समस्या बन जाता है।

और यहां एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है। किसी नेता का अजीब बोलना या असामान्य उदाहरण देना hallucination नहीं है। hallucination एक चिकित्सकीय शब्द है। किसी सार्वजनिक भाषण के आधार पर किसी व्यक्ति को मानसिक बीमारी का प्रमाणपत्र देना न वैज्ञानिक है, न जिम्मेदार पत्रकारिता।

लेकिन राजनीतिक मनोविज्ञान में इससे कहीं ज्यादा उपयोगी शब्द हैं—self-narrative, impression management और attention-seeking communication

अर्थात नेता अपने बारे में एक कहानी बनाता है, जनता के सामने अपनी खास छवि प्रस्तुत करता है और ऐसे दृश्य तथा वाक्य चुनता है जो उसकी ओर ध्यान खींचें।

क्या राहुल गांधी ऐसा करते हैं?

संभव है। और अगर करते हैं तो यह अपने आप में कोई असाधारण बात नहीं। राजनीति में हर बड़ा नेता image बनाता है। कोई मजबूत प्रशासक की छवि बनाता है, कोई गरीबों के मसीहा की, कोई राष्ट्रवादी नेता की, कोई विकास पुरुष की। राहुल गांधी ने शायद अपने लिए संघर्षशील, संवेदनशील, निडर और तपस्वी नेता की छवि बनाने की कोशिश की है।

समस्या तब शुरू होती है जब छवि, क्षमता की जगह लेने लगे।

बारिश में भीगना नेतृत्व नहीं है। ठंड में टी-शर्ट पहनना नेतृत्व नहीं है। पैदल चलना नेतृत्व नहीं है। किसी के घर जाकर खाना खाना भी अपने आप में नेतृत्व नहीं है। ये सब नेतृत्व के प्रतीक हो सकते हैं। लेकिन नेतृत्व तब साबित होता है जब नेता कठिन नीतिगत फैसले ले, गलतियों को स्वीकार करे, विशेषज्ञों को सुने, तथ्यों की जांच करे और अपने फैसलों के परिणाम की जिम्मेदारी ले।

राहुल गांधी के लिए यही असली परीक्षा है।

उनकी समस्या यह नहीं कि वे अलग हैं। लोकतंत्र को अलग तरह के नेताओं की जरूरत होती है। समस्या यह है कि उनकी अलग दिखने की कोशिश कई बार उनके राजनीतिक संदेश से बड़ी दिखाई देने लगती है।

और शायद इसी वजह से उनके आलोचक उन्हें गंभीर राजनेता की बजाय ‘परफॉर्मर’ कहने लगते हैं।

लेकिन यहां कांग्रेस के लिए भी एक बड़ा सवाल है। अगर पार्टी राहुल गांधी को भविष्य के राष्ट्रीय नेतृत्व के चेहरे के रूप में देखती है तो क्या उसे केवल उनके भाषणों की लोकप्रियता और सोशल मीडिया की दृश्यता से संतुष्ट होना चाहिए? क्या पार्टी के भीतर कोई ऐसा तंत्र है जो भाषण से पहले तथ्य जांचे? क्या तकनीकी और आर्थिक विषयों पर उन्हें विशेषज्ञों से नियमित ब्रीफिंग मिलती है? क्या गलत बयान के बाद सार्वजनिक रूप से उसे सुधारने की राजनीतिक संस्कृति है?

क्योंकि लोकतंत्र में जनता को परफॉर्मेंस से कुछ समय तक आकर्षित किया जा सकता है, लेकिन लंबे समय तक प्रभावित नहीं किया जा सकता।

राहुल गांधी को किसी मनोचिकित्सक की जरूरत है या नहीं, इसका फैसला वे और उनके चिकित्सक ही कर सकते हैं। लेकिन राजनेता राहुल गांधी को राजनीतिक सुधार की जरूरत जरूर है।

उन्हें कम प्रतीक और ज्यादा नीति चाहिए। कम आत्मकथा और ज्यादा राष्ट्रीय कथा चाहिए। कम ‘मैं’ और ज्यादा ‘भारत’ चाहिए। कम असाधारण दावे और ज्यादा प्रमाण चाहिए। और सबसे ज्यादा जरूरत है—बोलने से पहले तथ्यों की जांच और बोलने के बाद अपनी बात की जिम्मेदारी लेने की।

क्योंकि लोकतंत्र में मतदाता यह देखने नहीं बैठा है कि नेता कितनी ठंड सह सकता है। वह यह देखने बैठा है कि नेता देश की समस्याएं कितनी गंभीरता से समझता है।

सफेद टी-शर्ट राजनीतिक पहचान बना सकती है। पैदल यात्रा राजनीतिक ऊर्जा पैदा कर सकती है। ‘तपस्वी’ शब्द राजनीतिक रोमांच पैदा कर सकता है। लेकिन अंततः चुनाव के मैदान में एक ही सवाल लौटकर आता है—

आपने देश के लिए किया क्या?

यही वह सवाल है, जिसका जवाब किसी टी-शर्ट, किसी यात्रा और किसी राजनीतिक रूपक से नहीं दिया जा सकता।

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